EN हिं
Home Blogब्लॉग Which Branch Are We Cutting?
By Dr P. K. Jha · M.Ch AIIMS · 30+ years

Which Branch Are We Cutting?

English हिन्दी
Which Branch Are We Cutting?

हम किस शाखा को काट रहे हैं?

कालिदास के बारे में एक प्रसिद्ध कथा कही जाती है कि वे जिस शाखा पर बैठे थे, उसी शाखा को काट रहे थे। यह प्रसंग ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित हो या न हो, लेकिन मनुष्य के व्यवहार का एक गहरा रूपक अवश्य है।

क्योंकि आज हममें से बहुत से लोग जाने-अनजाने वही कर रहे हैं।

हम उस व्यक्ति से क्रोध रखते हैं जो कठिन समय में हमारे साथ खड़ा होने वाला है। पति-पत्नी एक-दूसरे को वर्षों तक क्षमा नहीं करते, जबकि अंततः वही एक-दूसरे का सबसे बड़ा सहारा बनने वाले हैं।

हम उसी भाई से दूरी बना लेते हैं जिसने आवश्यकता के समय हाथ बढ़ाया था।

हम अपने ही माता-पिता को उपेक्षित कर देते हैं, जबकि उन्होंने हमारे लिए अपने जीवन के सबसे अच्छे वर्ष लगा दिए।

हम उस देश को लगातार कोसते हैं जो हमें शिक्षा, सड़क, सुरक्षा, अवसर और जीवन जीने का स्थान देता है — और भूल जाते हैं कि देश केवल सरकार नहीं, करोड़ों मनुष्यों का साझा घर है।

और यही व्यवहार हम अपने शरीर के साथ करते हैं

हम अपने शरीर को तब तक नज़रअंदाज़ करते रहते हैं जब तक वह हमारे साथ चुपचाप काम करता रहता है।

  • दिल बिना छुट्टी लिए धड़कता है।
  • फेफड़े बिना शिकायत साँस लेते हैं।
  • मस्तिष्क हर क्षण हमारे लिए काम करता है।
  • किडनी रक्त को साफ करती है।
  • यकृत अपना काम करता रहता है।
  • मांसपेशियाँ हमें उठाती हैं, चलाती हैं, काम कराती हैं।

और हम? उसी शरीर को नींद से वंचित करते हैं, गलत भोजन देते हैं, निष्क्रिय रखते हैं, तनाव से भरते हैं और फिर पूछते हैं —

“मेरे शरीर ने मेरा साथ क्यों छोड़ दिया?”

हम प्रकृति के साथ भी यही कर रहे हैं

जिस हवा के बिना हम कुछ मिनट भी नहीं रह सकते, उसी हवा को प्रदूषित कर रहे हैं।

जिस पानी के बिना कुछ दिन भी जीवित नहीं रह सकते, उसी पानी में ज़हर घोल रहे हैं।

जिस मिट्टी से हमारा भोजन आता है, उसी मिट्टी को रसायनों और कचरे से नष्ट कर रहे हैं।

पेड़ काटकर गर्मी से बचने के लिए एयर-कंडीशनर बढ़ा रहे हैं। नदियों को गंदा करके बोतलबंद पानी खरीद रहे हैं। प्रकृति को नष्ट करके फिर प्राकृतिक आपदाओं से डर रहे हैं।

हम जिस शाखा पर बैठे हैं, उसी को काट रहे हैं।

ज्ञान के साथ भी हमारा यही व्यवहार है

मनुष्य को विवेक दिया गया ताकि वह अपनी इच्छाओं का गुलाम न बने। लेकिन हम ज्ञान सुनते हैं और जीवन में लागू नहीं करते।

  • हमें पता है कि क्रोध नुकसान करता है — फिर भी क्रोध को पालते हैं।
  • हमें पता है कि ईर्ष्या हमें भीतर से खाती है — फिर भी तुलना करते हैं।
  • हमें पता है कि नशा शरीर को नुकसान पहुँचाता है — फिर भी करते हैं।
  • हमें पता है कि लगातार स्क्रीन और निष्क्रिय जीवन हमें कमजोर कर रहा है — फिर भी उसी में घंटे बिताते हैं।
  • हमें पता है कि कटु शब्द रिश्ते तोड़ देते हैं — फिर भी सबसे अधिक चोट उसी व्यक्ति को पहुँचाते हैं जिसे हम सबसे अधिक प्रेम करने का दावा करते हैं।

ज्ञान हमारे पास है। समस्या ज्ञान की कमी नहीं — ज्ञान के प्रति हमारी गैर-जिम्मेदारी है।

हम अपने भविष्य के साथ भी यही कर रहे हैं

आज की सुविधा के लिए भविष्य का संसाधन खर्च कर देते हैं। आज का सुख खरीदने के लिए कल का कर्ज लेते हैं।

आज की लोकप्रियता के लिए ऐसी बातें कहते हैं जिनका नुकसान समाज को वर्षों तक भुगतना पड़ सकता है। आज की राजनीति के लिए समाज को बाँटते हैं और फिर आने वाली पीढ़ियों से एकता की उम्मीद करते हैं।

अपने बच्चों को दुनिया देने के बजाय हम उन्हें विवादों की विरासत दे रहे हैं।

हम भविष्य की शाखा भी काट रहे हैं।

तो समाधान क्या है?

समाधान केवल यह कहना नहीं है कि “लोगों को बदलना चाहिए।” परिवर्तन चार शब्दों से शुरू हो सकता है।

AWARE — जागरूक बनो

पहले देखो कि तुम क्या कर रहे हो। किससे लड़ रहे हो? किसे चोट पहुँचा रहे हो? अपने शरीर के साथ क्या कर रहे हो? प्रकृति के साथ क्या कर रहे हो? अपने समय के साथ क्या कर रहे हो?

जो दिखाई ही नहीं देता, उसे बदला नहीं जा सकता।

ACCEPT — स्वीकार करो

हर गलती के लिए किसी और को दोष देना बंद करो। हाँ, परिस्थितियाँ कठिन हो सकती हैं। हाँ, दूसरे लोग गलत हो सकते हैं। हाँ, व्यवस्था में समस्याएँ हो सकती हैं।

लेकिन अपने हिस्से की जिम्मेदारी स्वीकार करनी होगी। “मैंने कहाँ गलती की?” — यह प्रश्न परिवर्तन की शुरुआत है।

RESPONSIBLE — जिम्मेदार बनो

जिससे जीवन मिला है, उसके प्रति जिम्मेदारी रखो — अपने शरीर के प्रति, अपने परिवार के प्रति, अपने समाज के प्रति, अपने देश के प्रति, प्रकृति के प्रति, और आने वाली पीढ़ियों के प्रति।

अधिकार माँगना आसान है। जिम्मेदारी स्वीकार करना मनुष्य होने की पहचान है।

COMMIT — संकल्प लो

जागरूक होना पर्याप्त नहीं। स्वीकार करना पर्याप्त नहीं। जिम्मेदारी समझ लेना भी पर्याप्त नहीं। कुछ करना होगा।

  • आज से शरीर के लिए कुछ बदलना है।
  • आज से रिश्ते में एक शिकायत कम करनी है।
  • आज से प्रकृति को नुकसान पहुँचाने वाली एक आदत छोड़नी है।
  • आज से क्रोध में बोलने से पहले रुकना है।
  • आज से अपने ज्ञान को व्यवहार में उतारना है।

छोटा कदम हो सकता है। लेकिन निरंतर होना चाहिए।

क्योंकि जीवन का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है

हम सुरक्षा चाहते हैं, लेकिन अपने सुरक्षा-तंत्र को ही कमजोर करते हैं। हम प्रेम चाहते हैं, लेकिन प्रेम करने वाले को ही चोट पहुँचाते हैं। हम स्वस्थ रहना चाहते हैं, लेकिन शरीर की उपेक्षा करते हैं। हम स्वच्छ हवा चाहते हैं, लेकिन प्रदूषण करते हैं। हम शांति चाहते हैं, लेकिन क्रोध और विभाजन फैलाते हैं। हम भविष्य चाहते हैं, लेकिन भविष्य के संसाधन आज ही नष्ट कर देते हैं।

और फिर पूछते हैं — “दुनिया इतनी खराब क्यों हो गई?”

शायद शुरुआत दुनिया से नहीं, हमसे होनी चाहिए। जिस शाखा पर हम बैठे हैं, उसे काटना बंद करना होगा।

जागो। देखो। स्वीकार करो। जिम्मेदारी लो। और फिर संकल्प के साथ बदलो।

क्योंकि अंततः — प्रकृति से अलग हम नहीं हैं। परिवार से अलग हम नहीं हैं। समाज से अलग हम नहीं हैं। शरीर से अलग हम नहीं हैं। और इस जीवन से अलग हमारा कोई दूसरा जीवन नहीं है।

जिसे हम नष्ट कर रहे हैं, संभव है वही हमें बचाए हुए हो।

और जिस दिन यह बात सच में समझ आ जाएगी, हम शाखा काटना बंद कर देंगे।

🩺 Book a Consultation🩺 परामर्श बुक करें

Consult Dr P K Jha — OPD at Gaur City 1, Greater Noida, or online. डॉ पी के झा से मिलें — गौर सिटी 1 OPD या ऑनलाइन।

📞 +91-9311696923 💬 WhatsApp 🧠 Free Symptom Checkमुफ़्त लक्षण जाँच
Back to all articlesसभी लेख देखें
WhatsApp Us